अब असली मोलभाव घड़ी कर रही है। भारत और अमेरिका ने 24 जून 2026 को द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण पर मंत्री स्तर की दो दिन की बातचीत पूरी की, और दोनों 24 जुलाई की समयसीमा से पहले समझौता करने की होड़ में हैं, वरना अमेरिका का अस्थायी टैक्स अपने आप ख़त्म हो जाएगा। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीयर से बातचीत की, और दोनों पक्षों पर महीनों की तैयारी को एक तय समझौते में बदलने का दबाव है।
भारतीय निर्यातकों के लिए दाँव बड़ा है। फ़रवरी में तय हुए ढाँचे के मुताबिक़ अमेरिका भारतीय सामान पर अपना टैक्स 50 प्रतिशत के भारी स्तर से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा, और यह बदलाव कपड़े से लेकर हीरे-गहने तक के सेक्टरों के लिए तय कर सकता है कि वे अपने सबसे बड़े बाज़ार में टिक पाते हैं या नहीं।
क्या हुआ
24 जून का दौर कूटनीति के एक व्यस्त दौर की मिसाल बना। ग्रीयर का दो दिन का दौरा उस मुलाक़ात के सिर्फ़ एक हफ़्ते बाद हुआ, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 17 जून को फ़्रांस में जी-7 शिखर सम्मेलन के मौक़े पर एक साल से ज़्यादा समय में पहली बार मिले, जिसने अटकी हुई बातचीत में नई जान डाली। दोनों नेताओं के संपर्क ने उस वार्ता को फिर पटरी पर लाने में मदद की, जो अमेरिका की बदलती टैक्स नीति से बिगड़ गई थी।
ढाँचा ख़ुद 7 फ़रवरी 2026 का है, जब दोनों पक्षों ने आपसी व्यापार पर एक अंतरिम समझौते की घोषणा की थी। इसकी मुख्य शर्तें साफ़ हैं। अमेरिका भारतीय सामान पर अपना टैक्स 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करेगा, और रूस से तेल ख़रीदने पर लगाया अलग 25 प्रतिशत टैक्स हटाएगा। बदले में भारत ने अमेरिका के सभी औद्योगिक सामान और कई कृषि उत्पादों पर टैक्स घटाने या ख़त्म करने का प्रस्ताव दिया है।
नीचे देखिए कि प्रस्तावित समझौते के तहत टैक्स की तस्वीर कैसे बदलती है।
| उपाय | पहले | समझौते के बाद |
|---|---|---|
| भारतीय सामान पर अमेरिकी टैक्स | 50% | 18% |
| रूस-तेल वाला अतिरिक्त टैक्स | 25% | हटाया गया |
| अस्थायी आम अमेरिकी टैक्स | 10% (24 जुलाई को ख़त्म) | समझौते से बदला |
जिन अमेरिकी सामानों के लिए भारत ने दरवाज़ा खोलने का प्रस्ताव दिया, उनकी सूची ख़ास है: पशु चारे का डिस्टिलर्स ग्रेन (DDGs), लाल ज्वार, सूखे मेवे, ताज़े और प्रोसेस किए फल, सोयाबीन तेल, और वाइन तथा शराब, समेत कई।
निवेशकों के लिए इसका मतलब
समझौता निर्यात से जुड़े सेक्टरों पर छाया एक भारी बादल हटा देगा। 50 प्रतिशत टैक्स पर भारत का कई सामान अमेरिकी बाज़ार में महँगा पड़ जाता है, इसलिए 18 प्रतिशत पर आने से कपड़े, हीरे-गहने, इंजीनियरिंग सामान और रसायन की प्रतिस्पर्धा सीधे सुधरेगी। ये मेहनत-भरे उद्योग हैं, इसलिए इसका असर कंपनियों के मुनाफ़े से आगे बढ़कर नौकरियों तक पहुँचता है।
रूस-तेल वाला 25 प्रतिशत टैक्स हटना भी मायने रखता है। यह रिश्ते में एक प्रतीकात्मक काँटा बन गया था, और इसका हटना यह संकेत देगा कि दोनों पक्ष अपने मतभेद व्यापार में फैलाए बिना सँभाल सकते हैं। निवेशकों के लिए यह भारत-अमेरिका आर्थिक रिश्ते की ज़्यादा मज़बूत ज़मीन की ओर इशारा है।
बाज़ार की प्रतिक्रिया
बाज़ार ने उम्मीद के पक्ष में वोट दिया। 24 जून को सेंसेक्स 790.54 अंक यानी 1.04 प्रतिशत चढ़कर 76,991.22 पर और निफ़्टी करीब 197 अंक बढ़कर 24,021.65 पर पहुँचा, जिसमें IT, रियल्टी और बैंक शेयरों ने तेज़ रिकवरी का नेतृत्व किया। इस बढ़त ने पिछले दिन की भारी गिरावट का बड़ा हिस्सा पलट दिया, जो दिखाता है कि भावना अब व्यापार की ख़बरों से कितनी जुड़ी है। पूरे सत्र की जानकारी हमारे आज के शेयर बाज़ार पेज पर पढ़ें।
निर्यात से जुड़े शेयरों का सबसे ज़्यादा दाँव नतीजे पर है, पर तेज़ी का दायरा फैला रहा, जो इस राहत का असर था कि दोनों पक्ष अब भी सकारात्मक ढंग से बात कर रहे हैं, न कि टैक्स की कगार की ओर बढ़ रहे हैं। यह प्रतिक्रिया जोखिम भी बताती है: अगर बातचीत अटकी, तो यही उम्मीद तेज़ी से उलट सकती है।
निवेशक किन बातों पर नज़र रखें
सबसे पहले यह देखें कि क्या 24 जुलाई से पहले समझौता हो जाता है। अगर दोनों पक्ष समयसीमा चूक जाते हैं और 10 प्रतिशत अस्थायी टैक्स फिर लागू हो जाता है, तो हाल के हफ़्तों में बनी सद्भावना तेज़ी से उतर सकती है, और उन्हीं निर्यात सेक्टरों पर असर पड़ेगा जो इस उम्मीद पर चढ़े हैं।
दूसरी बात, खेती और डेयरी पर बारीक शर्तें। भारत यहाँ कितनी रियायत देता है, यही तय करेगा कि समझौता कितना असरदार है और देश के भीतर राजनीतिक रूप से कैसे चलता है, जहाँ किसान संगठन अमेरिकी आयात पर किसी भी छूट पर पैनी नज़र रखते हैं।
तीसरी बात, अंतिम मसौदे में कौन-से सेक्टर नाम से शामिल होते हैं। कपड़े, दवा, ऑटो पुर्ज़े और हीरे-गहने कम अमेरिकी टैक्स से साफ़ फ़ायदे में रहेंगे, इसलिए ब्योरा तय करेगा कि बाज़ार आगे कहाँ ध्यान देता है।
किन जोखिमों पर नज़र रखें
सबसे साफ़ जोखिम यह है कि समयसीमा खिसक जाए। व्यापार समझौते अक्सर अपनी तय तारीख़ से आगे चले जाते हैं, और 24 जुलाई की चूक बातचीत जारी रहने पर भी अनिश्चितता पैदा करेगी।
दूसरा जोखिम खेती और डेयरी रियायतों पर भारत के भीतर राजनीतिक विरोध है, जो वार्ताकारों को समझौता छोटा करने या टालने पर मजबूर कर सकता है। तीसरा जोखिम यह है कि अमेरिकी व्यापार नीति फिर बदल जाए, जैसा पहले भी हुआ है, जिससे वे शर्तें ही बदल जाएँ जिनके सामने भारत बातचीत कर रहा है।
फ़िलहाल दिशा सकारात्मक है, और बाज़ार ने इसे भाँप लिया है। पर एक ढाँचा कोई तय समझौता नहीं होता, और अगला महीना, जब 24 जुलाई की समयसीमा सिर पर होगी, बताएगा कि दो साल की रुक-रुक कर चली बातचीत आख़िरकार कुछ टिकाऊ देती है या नहीं।