लगातार आठ हफ़्ते, यह कम नहीं होता। निफ़्टी 50 ने 3 अगस्त से 25 सितंबर 2026 के बीच लगातार आठ हफ़्तों तक गिरावट के साथ बंद किया, जो 2001 के बाद सबसे लंबा सिलसिला है, जब यह लगातार नौ हफ़्ते गिरा था। अक्टूबर के शुरुआती दिनों में एक और गिरावट वाला हफ़्ता यह 25 साल पुराना रिकॉर्ड बराबर कर देगा।
आठ हफ़्ते इतने असामान्य क्यों हैं
एक बुरा हफ़्ता आम बात है। पिछले 25 साल में सिर्फ़ एक बार, 2001 में, इतना लंबा गिरावट का सिलसिला देखा गया है, और यही वजह है कि इस तुलना के मायने हैं, इसे रोज़मर्रा के उतार-चढ़ाव जैसा मान लेना ग़लत होगा।
2001 के सिलसिले के लिए तीन अलग-अलग झटकों का एक साथ आना ज़रूरी था। 2026 के सिलसिले के लिए सिर्फ़ दो चीज़ों, तेल और अमेरिकी ब्याज दर, का दो महीने तक बिना रुके साथ-साथ बना रहना ही काफ़ी रहा।
इतनी लंबी गिरावट क्यों बनी
2001 के उलट, इस बार कोई एक बड़ी घटना वजह नहीं बनी। कच्चा तेल इन आठ हफ़्तों में ज़्यादातर समय 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा, होरमुज़ जलडमरूमध्य के आसपास तनाव की वजह से, और बाद में सऊदी अरब ने इस रास्ते के इर्द-गिर्द तेल भेजने का दूसरा रास्ता निकाला, जिससे 30 सितंबर तक यह घटकर क़रीब 97 डॉलर रह गया। दो महीने तक महँगा तेल रहने से भारत का आयात बिल बढ़ा और रुपये पर दबाव पूरे समय बना रहा।
अमेरिकी तरफ़ से भी राहत नहीं मिली। अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व ने 16 सितंबर को ब्याज दर बढ़ाकर 3.75 से 4.00 प्रतिशत कर दी, और अमेरिकी 10 साल के बॉन्ड की यील्ड 19 साल के उच्चतम स्तर, क़रीब 5.1 प्रतिशत तक पहुँच गई, जिससे पूरे समय डॉलर वाली संपत्तियाँ भारतीय शेयरों से ज़्यादा आकर्षक बनी रहीं।
धक्का नहीं, धीमी गिरावट क्यों
इस सिलसिले की सबसे ख़ास बात इसकी शक्ल है। 25 साल के रिकॉर्ड के क़रीब पहुँचने वाली गिरावट में आमतौर पर घबराहट में बिकवाली दिखती है, पर इन आठ हफ़्तों में निफ़्टी कभी एक दिन में 2 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं गिरा। इसकी वजह है कि इस बार दूसरी तरफ़ कौन खड़ा था।
घरेलू संस्थागत निवेशकों ने अकेले सितंबर 2026 में क़रीब 64,759 करोड़ रुपये की रिकॉर्ड ख़रीदारी की, जो अगस्त 2023 से चल रहे 38 महीनों के लगातार ख़रीदारी के सिलसिले, कुल मिलाकर लगभग 20.19 लाख करोड़ रुपये, का हिस्सा है, और इसे अगस्त में मासिक SIP (व्यवस्थित निवेश योजना) के ज़रिए आए रिकॉर्ड 32,297 करोड़ रुपये से ताक़त मिली। जिस-जिस हफ़्ते विदेशी निवेशकों ने बेचा, घरेलू म्यूचुअल फंड ने लगभग उतना ही ख़रीद लिया, जिससे एक तेज़ धक्का लगने की बजाय धीमी, हफ़्ता-दर-हफ़्ता गिरावट बनी।
सिलसिला टूटने के लिए क्या चाहिए
ऐसी लकीरें आमतौर पर चुपचाप नहीं टूटतीं। 2001 का नौ हफ़्तों का सिलसिला तभी टूटा जब घोटाले की जाँच और डॉट-कॉम संकट, दोनों अपने-अपने रास्ते पर आगे बढ़ चुके थे, और उसके बाद भी बाज़ार तुरंत नहीं संभला बल्कि लंबे समय तक कमज़ोर बना रहा।
2026 के लिए भी वैसी ही तारीख़ें सामने हैं। 7 अक्टूबर को रिज़र्व बैंक का फ़ैसला, 8 अक्टूबर से टीसीएस के नतीजों के साथ दूसरी तिमाही के नतीजों की शुरुआत, और 27-28 अक्टूबर को अमेरिकी फ़ेडरल रिज़र्व की बैठक, यही तीन मौक़े इस लकीर को किसी भी दिशा में तोड़ सकते हैं।
किन बातों का जोखिम है
दूसरा जोखिम यह मान लेना है कि सिलसिला टूटते ही तुरंत तेज़ उछाल आएगा। 2001 की मिसाल इसके उलट बताती है, लंबा सिलसिला टूटने के बाद भी कमज़ोरी बनी रह सकती है, क्योंकि जो दबाव इतने लंबे समय तक बना रहा, वह एक झटके में पूरी तरह ग़ायब नहीं होता। यह सामान्य जानकारी है, निवेश की सलाह नहीं।
आठ हफ़्ते गिरावट के, पर किसी एक दिन ज़्यादा नुक़सान नहीं, यह एक अलग तरह की गिरावट है, धीमी और धैर्यवान, तेज़ और हिंसक नहीं। अक्टूबर इसमें नौवाँ हफ़्ता और नया 25 साल का रिकॉर्ड जोड़ता है या इस लकीर को तोड़ता है, इसका जवाब महीने के पहले सात कारोबारी दिनों में ही मिल जाएगा।